स्कूलों का धीरे-धीरे फिर से खुलना शुरू हो गया है, लेकिन क्या उन्हें शारीरिक शिक्षा और खेलकूद की गतिविधियां भी शुरू कर देना चाहिए?



भारत के कई राज्यों में स्कूलों के खुलने के कारण वर्ष 2021 की शुरुआत सकारात्मक देखी जा रही है। स्कूल अभी अनियमित तरीके से खुल रहे हैं। हालांकि, यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि स्कूलों के संचालक खेलकूद और शारीरिक शिक्षा को, खासकर वर्तमान परिदृश्य में, अकेडमिक्स के समान ही प्राथमिकता दे रहे हैं।


खेलकूद और पोषण ऐसे दो तत्व हैं जो कई शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित लाभों के साथ, बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) को बढ़ा सकते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार एक बढ़ते बच्चे को स्वस्थ और चुस्त-दुरुस्त रहने के लिए हर दिन कम से कम 60 मिनट तक जमकर खेलना चाहिए। इसके अलावा, 2019 में अमेरिका में किये गये एक अध्ययन के अनुसार, व्यायाम करने वाले बच्चों की तुलना में व्यायाम में शामिल नहीं रहने वाले बच्चों में चिंता और अवसाद जैसी मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं होने की संभावना दोगुनी थी।


बच्चों में चिंता और अवसाद को कम करने के अलावा, खेलकूद तनाव कम करने में मदद करता है, बेंहतर आत्मविश्वास लाता है और उच्च आत्मसम्मान बनाये रखने में मदद करता है। इसकी वजह है शारीरिक गतिविधि या खेलकूद के कारण शरीर के भीतर पैदा होने वाला एंडोर्फिन, जो व्यक्ति को प्रसन्न रखता है और सकारात्मक एहसास प्रदान करता है। इसके अलावा, बच्चों में खेलकूद की भावना, अनुशासन और नेतृत्व से जुड़े मूल्यों की स्थापना भी सामाजिक-भावनात्मक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।


खेलकूद या शारीरिक शिक्षा न केवल बच्चे के स्वास्थ्य, रोग प्रतिरोधक क्षमता और फिटनेस में योगदान करती है, बल्कि उसके शैक्षणिक प्रदर्शन के लिए भी महत्वपूर्ण काम करती है। शारीरिक शिक्षा या खेलकूद आधुनिक शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। अब तक हो चुके कई अध्ययन बताते हैं कि खेलकूद और शैक्षणिक प्रदर्शन के बीच सीधा और सकारात्मक संबंध है।


उदाहरण के लिए, “बडी और अन्य द्वारा की गई रिसर्च बताती है कि एरोबिक गतिविधयां नहीं करने वाले छात्रों की तुलना में, एरोबिक करने वाले चुस्त-दुरुस्त छात्रों में गणित की परीक्षा पास करने की संभावना 2.4 गुना और रीडिंग टेस्ट पास करने की संभावना दो गुना अधिक होती है। इसके अलावा, 20से 40 मिनट तक ब्रिस्क वॉकिंग (तेज कदमों से चलने) से बच्चों में गणितीय प्रदर्शन में बेहतर होता है।”


इसके अलावा, अध्ययन यह भी बताते हैं कि अंग्रेजी और गणित में उच्च जीपीए का संबंध साप्ताहिक आधार पर खेलकूद में भागीदारी करने के साथ होता है।

बच्चों के साथ सार्थक रूप से जुड़ने और उनकी ध्यानाकर्षण अवधि, उपस्थिति और सहकर्मी संबंधों को बेहतर बनाने में खेलकूद का उपयोग एक उपकरण के रूप में भी किया जा सकता है। इसके अलावा, अध्ययनों से यह भी पता चला है कि व्यवस्थित रूप से तैयार की गई शारीरिक गतिविधि बच्चे के कक्षा संबंधी व्यवहार को लगभग 20% तक बेहतर बना सकती है।


इंस्टीट्यूट ऑफ यूथ स्पोर्ट्स 2009 के अनुसार, अधिकांश बच्चों ने अपने टाइम टेबल में खेलकूद को शामिल करने के बाद स्कूल जाने में दिलचस्पी दिखायी।


खेलकूद बच्चों में 21वीं सदी के कौशल का निर्माण करने में मदद करता है। खेलों से बच्चों में सीखने की 3 सी (क्रिटकल थिंकिंग, कोलोबोरेशन और क्रिएटिविटी, यानी गंभीरता से विचार करना, सहयोग करना और रचनात्मक प्रदर्शन करना) विकसित करने में भी मदद मिलती है। बच्चों कोविज्ञान और गणित की विभिन्न अवधारणाएं जैसे गति, वेग, गुरुत्वाकर्षण और गतिज ऊर्जा आदि खेल की मदद से सिखायी जा सकती है।


अकेडमिक्स के साथ खेलकूद को एकीकृत करने का महत्व समझाते हुए, स्पोर्टस विलेज स्कूल्स के बिजनेस हेड, कृश अयंगर ने कहाकि "यह ध्यान देने योग्य है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में बच्चे की शिक्षा के अभिन्न अंग के रूप में खेलकूद और शारीरिक गतिविधि को शामिल किया गया है। मुख्य शैक्षिक पाठ्यक्रम में खेलकूद को जोड़ने से शिक्षकों को बच्चे की विचार प्रक्रिया और सीखने की प्रक्रिया को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलेगी। बच्चे के संपूर्ण विकास पर केंद्रित फॉर्मेटिव असेसमेंट विकसित करने में भी खेल महत्वपूर्ण उपकरण हो सकत

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